दल्लेगांव, ठाकुरगंज (किशनगंज):
आज दल्लेगांव गांव ने अपने एक बुज़ुर्ग और बेहद सम्मानित चेहरे जनाब अलाउद्दीन साहब उर्फ ‘मुखिया’ को हमेशा के लिए खो दिया। आज शाम 5 बजे उनका जनाज़ा अदा किया गया और उन्हें पूरब टोला कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
लेकिन यह सफर आसान नहीं था — क्योंकि आज़ादी के 78 साल बाद भी दल्लेगांव के लोगों को अपने मय्यत को ले जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। जिस पुल का सपना वर्षों से देखा गया, वो आज भी अधूरा है। अलाउद्दीन साहब ने कभी कहा था –
“चलो अब बुढ़ापे में ही सही, उस पुल पर तो चल लेंगे।”
लेकिन अफ़सोस, वो सपना अधूरा रह गया।
मरहूम का जनाज़ा लेकर ग्रामीणों को नदी पार करना पड़ा, कीचड़, पानी और जोखिम के बीच। ये मंजर केवल एक व्यक्ति की अंतिम विदाई नहीं, बल्कि एक पूरे गांव की बेबसी और सिस्टम की नाकामी का आइना है।
मरहूम अलाउद्दीन साहब की मग़फिरत की दुआ करते हैं और प्रशासन से मांग करते हैं कि अब और देर न हो — इस अधूरे पुल को जल्द से जल्द पूरा किया जाए।
