गोपालगंज। उत्तर भारत की सियासत में अपने दबदबे और बाहुबली छवि के लिए मशहूर रहे पूर्व सांसद काली प्रसाद पांडेय का शुक्रवार देर शाम निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन से गोपालगंज समेत पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है। परिजनों के अनुसार, शनिवार शाम तक उनका पार्थिव शरीर गोपालगंज स्थित पैतृक गांव पहुंचेगा।
काली पांडेय मूल रूप से गोपालगंज जिले के विशंभरपुर थाना क्षेत्र के रमजीता गांव के निवासी थे। उनका राजनीतिक जीवन बेहद रोचक और संघर्षपूर्ण रहा। वर्ष 1980 से 1984 तक वह बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में कांग्रेस लहर के बीच उन्होंने जेल से ही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इस जीत के बाद उनका नारा “जेल का फाटक टूटेगा, काली पांडेय छूटेगा” पूरे उत्तर भारत में गूंजा और उनकी लोकप्रियता का प्रतीक बन गया।
काली पांडेय को राजनीति से ज्यादा उनकी बाहुबली छवि ने चर्चित बनाया। 80 और 90 के दशक में उन्हें न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे उत्तर भारत का सबसे बड़ा बाहुबली नेता माना जाता था। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि 1987 में आई निर्देशक एन. चंद्रा की फिल्म प्रतिघात के खलनायक “काली प्रसाद” का किरदार उन्हीं से प्रेरित बताया गया। हालांकि, यह दावा कभी प्रमाणित नहीं हो पाया, लेकिन गोपालगंज और आसपास के लोग इसे सच्चाई मानते रहे।
उनके निधन पर क्षेत्रीय राजनीति में गहरा शोक व्यक्त किया जा रहा है। गोपालगंज के लोग मानते हैं कि काली पांडेय ने चाहे बाहुबली छवि से पहचान बनाई हो, लेकिन जनता के साथ उनका गहरा जुड़ाव था। अब उनका आखिरी सफर पैतृक गांव में होगा, जहां हजारों की संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ने की संभावना है।
