अक्षर ज्ञान के साथ गीता के सुर: गया के विद्यालय में शालिनी राजपूत संगीत के माध्यम से गढ़ रहीं संस्कारित पीढ़ी

गया (बिहार):

बिहार के गयाजी में शिक्षा का एक अनोखा प्रयोग इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां एक विद्यालय ऐसा है, जहां बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता के सार को सुरों में पिरोकर संस्कारों की शिक्षा भी दी जा रही है। इस पहल की सूत्रधार हैं दया प्रकाश सरस्वती विद्या मंदिर की शिक्षिका शालिनी राजपूत, जो संगीत और हिंदी की अध्यापिका हैं।

शालिनी राजपूत अपनी कक्षा में हिंदी और अंग्रेजी के अक्षर ज्ञान के साथ-साथ गीता के श्लोक और उनके अर्थ संगीत के माध्यम से बच्चों को समझाती हैं। वह गीता के श्लोक संस्कृत में और उनके भावार्थ हिंदी में मधुर स्वर में गाकर प्रस्तुत करती हैं। उनकी आवाज और संगीत शैली बच्चों को इतना आकर्षित करती है कि वे सहज ही गीता के कठिन श्लोक और शब्दों को समझने व उच्चारण करने लगे हैं।

विद्यालय में हारमोनियम पर गीता के श्लोक गाती शालिनी का यह प्रयास न सिर्फ बच्चों को मंत्रमुग्ध करता है, बल्कि उन्हें मानसिक शांति और एकाग्रता भी प्रदान करता है। शालिनी बताती हैं कि इस पहल की शुरुआत उन्होंने तब की, जब उन्होंने बच्चों को परीक्षा के तनाव में देखा। ऐसे समय में गीता के श्लोकों को संगीत के माध्यम से सुनाने से बच्चों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला। इसके बाद बच्चों की रुचि लगातार बढ़ती चली गई।

शालिनी राजपूत वर्ष 2023 में इस विद्यालय से जुड़ी थीं। वर्तमान में विद्यालय में करीब 2500 छात्र-छात्राएं हैं। छोटे बच्चों को छोड़कर लगभग सभी कक्षाओं के छात्र गीता के कई श्लोक और उनके अर्थ समझने लगे हैं। शालिनी नियमित रूप से अभ्यास भी करवाती हैं, जिससे बच्चे आत्मविश्वास के साथ श्लोकों का उच्चारण कर पाते हैं।

औरंगाबाद जिले की रहने वाली शालिनी का संगीत से जुड़ाव बचपन से ही रहा है। वह महज तीन साल की उम्र से गाने लगी थीं। उनके पिता सियाराम और दादा भी संगीत प्रेमी रहे हैं। शालिनी बताती हैं कि संगीत उन्हें विरासत में मिला है। किशोरावस्था से ही वह भजनों से जुड़ गई थीं और श्रीमद्भगवद्गीता का नियमित पाठ करती रही हैं।

संगीत की औपचारिक शिक्षा के लिए शालिनी को झारखंड के रांची में भी कुछ समय तक रहना पड़ा। उन्होंने अपने गुरु अमित मिश्रा से संगीत की शिक्षा ली। गजना महोत्सव समेत कई विशेष अवसरों पर उन्हें पुरस्कार भी मिल चुके हैं। शालिनी बॉलीवुड और भोजपुरी गीतों के साथ-साथ भजनों में भी पारंगत हैं।

शालिनी राजपूत का मानना है कि कलयुग में बच्चों को संस्कारित करना बेहद जरूरी है और गीता का ज्ञान इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वह कहती हैं कि यदि लोग गीता के सार को अपने जीवन में अपनाएं, तो कई समस्याओं का समाधान स्वतः हो सकता है।

भविष्य को लेकर शालिनी का सपना भी बड़ा है। वह भजन गायन के क्षेत्र में अनूप जलोटा की तरह बड़ा मुकाम हासिल करना चाहती हैं। साथ ही, वह चाहती हैं कि उनके विद्यार्थी संस्कारयुक्त जीवन अपनाएं और समाज के लिए एक बेहतर उदाहरण बनें। अपने इस प्रयास को लेकर मिल रही सराहना से शालिनी बेहद खुश हैं और चाहती हैं कि शिक्षा के इस अनोखे मॉडल को अन्य विद्यालय भी अपनाएं।

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