आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम: चैती छठ पर भागलपुर के गंगा घाटों पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम: चैती छठ पर भागलपुर के गंगा घाटों पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

रिपोर्ट – अमित कुमार भागलपुर/ बिहार।

भागलपुर,चार दिवसीय लोक आस्था के महापर्व चैती छठ का समापन आज उदयाचलगामी भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ श्रद्धा और भक्ति के माहौल में संपन्न हो गया। भागलपुर सहित आसपास के नवगछिया, कहलगांव, पीरपैंती और सुल्तानगंज के गंगा घाटों पर हजारों श्रद्धालुओं ने सूर्योदय के समय जल में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की,अंतिम दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए व्रतियों में विशेष उत्साह देखा गया। सुबह होते ही गंगा घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर पूजा-अर्चना की, वहीं पुरुषों और बच्चों ने भी इस पर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। घाटों पर “छठी मईया” के गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।भागलपुर के प्रमुख गंगा घाटों—बरारी घाट, कुप्पाघाट, सीढ़ी घाट, आदमपुर घाट सहित अन्य स्थानों पर प्रशासन द्वारा भी व्यवस्था की गई थी, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। साफ-सफाई, सुरक्षा और प्रकाश की बेहतर व्यवस्था के कारण लोगों ने सुरक्षित माहौल में पूजा-अर्चना की।चैती छठ की खासियत यह है कि यह पूरी तरह से शुद्धता और अनुशासन का पर्व है। इसमें व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और पूरी श्रद्धा से सूर्य देव एवं छठी मईया की पूजा करते हैं। इस पर्व में किसी प्रकार का दिखावा नहीं होता, बल्कि सादगी और प्रकृति के प्रति आस्था प्रमुख होती है। बांस के बने सूप और दउरा में ठेकुआ, फल, गन्ना और अन्य प्रसाद चढ़ाए जाते हैं।हालांकि गंगा घाटों पर भारी भीड़ थी, लेकिन कई श्रद्धालुओं ने अपने घरों में ही छठ पूजा करने की परंपरा निभाई। कुछ लोगों ने अपने आंगन या छत पर कृत्रिम तालाब बनाकर, तो कुछ ने जमीन में गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। यह परंपरा विशेष रूप से उन लोगों के बीच प्रचलित है, जो किसी कारणवश घाट तक नहीं पहुंच पाते।सूर्योदय के अर्घ्य के साथ ही व्रतियों का कठिन निर्जला व्रत समाप्त हुआ, जिसे “पारण” कहा जाता है। व्रती पहले भगवान को प्रसाद अर्पित करते हैं और फिर स्वयं ग्रहण करते हैं। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य और आसपास के लोग भी प्रसाद ग्रहण कर इस पावन पर्व का हिस्सा बनते हैं।

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