78 साल बाद आज़ादी का आत्ममंथन: क्या शहीदों के सपनों का भारत बना?:- अंजनी कुमार सिंह

78 साल बाद आज़ादी का आत्ममंथन: क्या शहीदों के सपनों का भारत बना?:- अंजनी कुमार सिंह

संवाददाता शुभम कुमार बांका बिहार

बौंसी/बांका:- आजादी के 78 साल बीत गए। इन बीते हुए दिनों का कभी-कभी आकलन करने का मन करता है। सोचने लगता हूँ कि क्या आजादी का सिर्फ यही अर्थ होता है कि हम विदेशी सत्ता से मुक्ति पाएँ और देशी सत्ता स्थापित करें या इसके साथ-साथ कुछ और, या फिर ऐसी सत्ता की स्थापना जिसमें सामाजिक समरसता और सद्भाव के साथ लोग अपने पेशे को चुन सकें, जिसमें स्वतंत्र विचारों के साथ बेबसी, लाचारी आदि का लेशमात्र भी झलक देखने को न मिले और जिसमें सभी लोगों को रोजी-रोटी बिना अधिक परेशानी के मिल सके? उपर्युक्त बातों के बारे में जब सोचता हूँ, मुझे देश के उन दिवानों की याद आने लगती है जिन्होंने लोगों की खुशियों के लिए अपनी जान की कुर्बानी तक दी। कितने कष्ट उठाए होंगे, कितनी यातनाएँ सही होंगी और अंत में आजाद मुल्क के सपनों के साथ हमें अलविदा कहकर चले गए, इसकी कल्पना मात्र

से ही सिहरन सी उठ जाती है। क्या हमारे उन अमर शहीदों के यही सपने थे कि आजादी के वर्षों बाद कुछ राष्ट्रभक्त आजादी का अमृत महोत्सव मनाएंगे और वंदेमातरम जैसे पवित्र गीत, जो हिंदुस्तान के लोगों की आत्मा में आत्मसात है, पर बहस कर एक नए झगड़े को तरजीह देंगे? मातृभूमि तो सदा आदरणीय और पूजनीय है। क्या चौबीस कैरेट सोने पर भी सवाल उठाया जा सकता है? न जाने जमाने को क्या हो गया है, कैसी शिक्षा पाई है ऐसे लोग जो राष्ट्रगान पर बहस करते हैं। क्या ये सब हमारे मानसिक दिवालियेपन का परिचायक नहीं है? इन सब बातों को बोलकर न मैं किसी का अपमान कर रहा हूँ और न ही किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना चाहता हूँ। मैं तो सिर्फ अपने दिल की बात कर रहा हूँ। अक्सर मैं अपने आपसे पूछता रहता हूँ, क्या आज का भारत ऐसा है जिसका सपना हमारे शहीदों ने देखा था? क्या आज सच्चे अर्थ में सामाजिक समरसता है? क्या गरीबी, लाचारी, बेरोजगारी आदि के कठिन दौर से हम गुजर नहीं रहे हैं? क्या विकास का अधिकांश भाग लूटने में सक्षम लोगों द्वारा नहीं लूट लिया जाता है? यही कुछ बुनियादी सवाल मेरे मन में उठते रहते हैं

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