बिहार में लड़कियों के बाल विवाह में 70 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट

बिहार

दशकों से बड़े पैमाने पर बाल विवाह के लिए सुर्खियों में रहा बिहार एक बड़े बदलाव की ओर है। शोध रिपोर्ट, ‘टिपिंग प्वाइंट टू जीरो : एविडेंस टूवर्ड्स ए चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया’ के अनुसार बिहार में लड़कियों के बाल विवाह की दर में 70 प्रतिशत जबकि लड़कों के बाल विवाह की दर में 68 प्रतिशत कमी आई है। यह रिपोर्ट बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने जारी की। रिपोर्ट के अनुसार खराब आर्थिक स्थिति (90%), बच्चों के लिए अच्छा जोड़ीदार मिल जाना (65%) और सुरक्षा के सवाल (39%) अब भी इस राज्य में बाल विवाह के पीछे प्रमुख कारण हैं। किशनगंज में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए काम कर रहे जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन जन निर्माण केंद्र ने पिछले तीन वर्षों में जिला प्रशासन, पंचायतों और सामुदायिक सदस्यों के साथ बेहद करीबी समन्वय से काम करते हुए जिले में 653 बाल विवाह रुकवाए हैं।
यह रिपोर्ट जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहैवियरल चेंज फॉर चिल्ड्रेन (सी-लैब) ने तैयार की है। बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के बिहार में 32 सहयोगी संगठन राज्य के 38 जिलों में काम कर रहे हैं। इस सर्वे में बिहार के 150 गांवों के आंकड़े जुटाने के लिए सबसे पहले आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, स्कूल शिक्षकों, सहायक नर्सों, दाइयों और पंचायत सदस्यों जैसे अग्रिम पंक्ति के लोगों से संपर्क कर उन्हें इस शोध और सर्वे से जोड़ा गया।
बिहार दशकों से बाल विवाह के मामले में देश के शीर्ष राज्यों में शुमार रहा है और ऐसे में रिपोर्ट के नतीजे बेहद अहम बदलावों की ओर इशारा करते हैं। बिहार के 150 गांवों में हुए इस सर्वे में 92% प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके गांवों में बाल विवाह या तो पूरी तरह बंद हो गया है या काफी हद तक इस पर लगाम लग चुकी है। साथ ही, 99% उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें बाल विवाह की रोकथाम से संबंधित कानूनों के बारे में मालूम है और 89% ने कहा कि यह जानकारी उन्हें गैरसरकारी संगठनों से मिली। इसके अलावा 82% ने कहा कि उन्हें सामुदायिक बैठकों में यह जानकारी मिली।
इस रिपोर्ट के नतीजों से उत्साहित जन निर्माण केंद्र के निदेशक राकेश कुमार सिंह ने कहा, “बाल विवाह के मामले में बिहार देश के शीर्ष राज्यों में शुमार रहा है। लेकिन अब बदलाव की धारा बह रही है और हमें बाल विवाह की रोकथाम के मोर्चे पर अभूतपूर्व और अप्रत्याशित नतीजे मिले हैं। अब हमें बदलाव की यह रफ्तार बरकरार रखने और बाल विवाह मुक्त बिहार सुनिश्चित करने के लिए जिला प्रशासन, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और ग्रामीण समुदाय के साथ मिलकर और कड़ी मेहनत की जरूरत है।”
रिपोर्ट आगे कहती है कि राज्य में 97 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने जागरूकता अभियानों को बाल विवाह के खिलाफ सबसे प्रभावी औजार करार दिया तो 68 प्रतिशत ने कहा कि गिरफ्तारी और एफआईआर जैसी कानूनी कार्रवाइयों ने बिहार में बाल विवाह से निपटने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। यह पूछने पर कि क्या उन्हें भारत सरकार के बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के बारे में पता है तो 97 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इसका जवाब ‘हां’ में दिया। आश्चर्यजनक रूप से 93 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे जागरूकता अभियानों के दौरान बाल विवाह के खिलाफ शपथ ले चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय अभियान में गैरसरकारी संगठनों की अग्रणी भूमिका रही है।
बाल विवाह के खात्मे के लिए बिहार में इसके प्रति रवैये में तब्दीली, व्यापक नीतिगत बदलावों और जमीनी कार्रवाइयों की सराहना करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संयोजक रवि कांत ने कहा, “राज्य सरकार ने ग्राम पंचायतों की जवाबदेही तय करने, पंचायतों के सशक्तीकरण और सभी संबंधित पक्षों को साथ लेते हुए जमीन पर जागरूकता अभियान चलाने जैसे नीतिगत कदम उठाए हैं। इसके नतीजे अब दिखने लगे हैं। हम आश्वस्त हैं कि इस तरह के समन्वित प्रयासों से बिहार 2030 से पहले बाल विवाह से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा।”
रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशों में कहा गया है कि बाल विवाह को 2030 तक पूरी तरह खत्म करने के लिए कानून पर सख्ती से अमल, बेहतर रिपोर्टिंग व्यवस्था, विवाह का अनिवार्य पंजीकरण और बाल विवाह मुक्त भारत पोर्टल के बारे में गांव-गांव तक लोगों में जागरूकता का प्रसार जरूरी है। साथ ही रिपोर्ट ने यह सुझाव दिया है कि बाल विवाह के खिलाफ देशभर में लोगों को जोड़ने और जागरूक करने के लिए एक राष्ट्रीय बाल विवाह विरोधी दिवस घोषित किया जाए।

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