ठाकुरगंज प्रखंड अंतर्गत पटेसरी पंचायत इन दिनों विवादों में घिर गई है। मोहम्मरम के पवित्र महीने में अजीबोगरीब गतिविधियों ने क्षेत्र में बहस को जन्म दे दिया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ तत्व मोहम्मरम के नाम पर ऐसे कार्य कर रहे हैं जो यज़ीद की फौज की खुशी का प्रतीक बनते हैं — यानी उस यज़ीद की जो करबला में हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियों का क़त्ल करने वाला था।
मोहम्मरम जैसे ग़मगीन महीने में जहाँ मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं और नीयाज़-फातिहा व ताज़ियत करते हैं, वहीं पटेसरी पंचायत में “अखाड़ा” जैसी गतिविधियों की शुरुआत कर दी गई है — जो पहले खत्म हो चुकी थी। सवाल ये उठ रहा है कि क्या यह एक नया फ़ितना (विवाद) नहीं है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जो लोग यह कार्य कर रहे हैं, वे यज़ीद की सोच का समर्थन कर रहे हैं या इमाम हुसैन के नाम पर यह दिखावा कर रहे हैं? समाज में यह भी चर्चा हो रही है कि जो उलेमा (इस्लामी विद्वान) इन गलत गतिविधियों पर चुप्पी साधे हुए हैं, क्या वे “गूंगे शैतान” की श्रेणी में नहीं आते?
लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि एक तरफ नीयाज़ और फातिहा की रस्में निभाई जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दहेज, सूद (लोन) जैसे हराम चीजों के साथ अब यह नया “अखाड़ा” नामक काम भी शुरू कर दिया गया है, जो मोहम्मरम की रूहानियत और शहादत की भावना को ठेस पहुंचाता है।
स्थानीय निवासी ने कहा:
“लानत है ऐसे सोच और ऐसे काम पर। अब समय आ गया है कि उलेमा खामोशी तोड़ें और इन गलत गतिविधियों के खिलाफ आवाज़ उठाएं, ताकि इस्लाम की असली तालीम और इमाम हुसैन की कुर्बानी का पैगाम आम हो सके।”
निष्कर्ष:
पटेसरी पंचायत में जारी गतिविधियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं और समाज अब उलेमा व प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहा है ताकि इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ होने वाले कृत्यों पर रोक लगाई जा सके।
