लोक संस्कृति और परंपरा के संरक्षण का सशक्त संदेश, राजेश झा के निर्देशन में ज्योति कला केंद्र में लोक नाट्य ‘डोमकच’ की भावपूर्ण प्रस्तुति

लोक संस्कृति और परंपरा के संरक्षण का सशक्त संदेश, राजेश झा के निर्देशन में ज्योति कला केंद्र में लोक नाट्य ‘डोमकच’ की भावपूर्ण प्रस्तुति

रिपोर्ट – अमित कुमार भागलपुर/ बिहार

भागलपुर शहर के चंपानगर स्थित ज्योति कला केंद्र में लोक संस्कृति, लोकगीत और लोकनाट्य की जीवंत छटा देखने को मिली। प्रसिद्ध रंगकर्मी राजेश कुमार झा के निर्देशन में पारंपरिक लोक नाट्य ‘डोमकच’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। वही इस लोकनाट्य के शह निर्देशन संगीता झा ने किया , दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ कलाकार एवं रंगकर्मी कपिल देव रंग, सेवानिवृत्त शिक्षक रघुनंदन झा, ज्योति कला केंद्र के प्राचार्य चंचल कुमार नाटक के निदेशक राजेश कुमार झा सह निर्देशक संगीता झा सहित अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से किया।मंचन के दौरान कलाकारों ने अपनी सशक्त अभिनय क्षमता से दर्शकों को लोक संस्कृति की मिट्टी से जोड़ दिया। इस नाटक का निर्देशन राजेश कुमार झा ने किया, जबकि उन्होंने स्वयं सोम की भूमिका निभाई। सोमिन की भूमिका में मोनिका कुमारी, मालकिन के रूप में महेश शाह, लड़की के रूप में अर्चना कुमारी, डॉक्टर की भूमिका में जयंत जलद तथा दूल्हा के रूप में सौरभ कुमार ने अपने अभिनय से दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।संगीत पक्ष भी अत्यंत प्रभावशाली रहा। हारमोनियम पर कपिल देव कृपाल, नाल पर कृष्ण मंडल तथा लोक गायन की प्रस्तुति रूपम कुमारी ने दी। लोकगीतों की मधुर धुन और कलाकारों के जीवंत अभिनय ने ऐसा वातावरण बनाया कि दर्शक पूरी तरह लोक संस्कृति के रंग में रंग गए।
इस अवसर पर शहर के अनेक शिक्षाविद, समाजसेवी, चिकित्सक, कलाकार एवं संस्कृति प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में निर्देशक राजेश कुमार झा ने कहा कि आज के समय में युवा तेजी से पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे दौर में अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी लोक संस्कृति को जानें, समझें और उसे आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

क्या है ‘डोमकच’?

डोमकच बिहार, झारखंड और मिथिला-अंग क्षेत्र का अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक लोक नाट्य एवं लोकनृत्य है। इसका मंचन मुख्य रूप से विवाह समारोह के दौरान किया जाता है। जब बारात दूल्हे के साथ लड़की के घर चली जाती है, तब घर में बची महिलाएं पूरी रात गीत, नृत्य और हास्य-व्यंग्य के माध्यम से डोमकच प्रस्तुत करती हैं। इसमें महिलाएं पुरुषों का वेश धारण कर सामाजिक जीवन, पारिवारिक संबंधों, रीति-रिवाजों और हास्यपूर्ण प्रसंगों का अभिनय करती हैं। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक जीवन, सामाजिक एकता, महिला अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक माना जाता है। बदलते समय में ऐसे लोकनाट्यों का मंचन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
कार्यक्रम की सफल प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि लोक संस्कृति को मंच और संरक्षण मिले तो उसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। कलाकारों की समर्पित प्रस्तुति और दर्शकों की उत्साहपूर्ण सहभागिता ने इस सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया।

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