डेस्क/बिहार
लोकेशन/भागलपुर
रिपोर्ट/अमित कुमार
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डीटीओ कार्यालय में दलालों का राज ! कुर्सी से लेकर फाइल तक कोड का खेल, सीसीटीवी बंद होने के बीच हर महीने करोड़ों की उगाही का आरोप।।
लाइसेंस और वाहनों के कागजात के लिए अतिरिक्त रकम नहीं देने पर अड़ंगा लगाने का दावा, कार्यालय के भीतर खुलेआम होती है सौदेबाजी
भागलपुर जिला परिवहन कार्यालय में सरकारी व्यवस्था के समानांतर कथित तौर पर दलालों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय है। लाइसेंस बनवाने से लेकर वाहनों के कागजात, रजिस्ट्रेशन और सत्यापन तक के काम में अतिरिक्त रकम की मांग किए जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। आरोप है कि निर्धारित सरकारी शुल्क के अतिरिक्त रकम नहीं देने वाले लोगों की फाइलों में कभी कागजात की कमी तो कभी प्रक्रिया संबंधी आपत्ति बताकर उन्हें परेशान किया जाता है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस दलाली व्यवस्था पर कार्रवाई होनी चाहिए, उसी के बीच कथित तौर पर कुछ दलाल कार्यालय के अंदर ही घंटों बैठते हैं। कार्यालय में उनके लिए बाकायदा कुर्सी लगी होने की बात सामने आई है। आरोपों के केंद्र में महेश प्रसाद नामक व्यक्ति का नाम लिया जा रहा है, जिसके बारे में दावा है कि वह नियमित रूप से कार्यालय में बैठकर लोगों से लाइसेंस और वाहन संबंधी कार्यों के नाम पर सौदेबाजी करता है।
अधिकारी की कुर्सी के सामने दलाल की स्थायी कुर्सी?
मंगलवार को जब हमारी टीम जिला परिवहन कार्यालय पहुंची, तो वहां महेश प्रसाद नामक व्यक्ति को कार्यालय परिसर में बैठा देखा गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वह वाहनों के कागजात के सत्यापन और लाइसेंस से संबंधित कार्यों को लेकर लोगों से बातचीत कर रहा था। कार्यालय में उसकी मौजूदगी ऐसी बताई गई कि मानो वह विभाग का नियमित कर्मचारी हो। आरोप है कि वह सुबह करीब दस बजे कार्यालय पहुंचता है और शाम तक वहां बैठा रहता है। हालांकि, जब इस संबंध में जिला परिवहन पदाधिकारी से जानकारी ली गई तो उन्होंने उक्त व्यक्ति के बारे में जानकारी होने से इनकार किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह विभाग का कर्मचारी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कोई व्यक्ति विभाग का कर्मचारी नहीं है तो वह नियमित रूप से कार्यालय के भीतर बैठकर लोगों से सरकारी कार्यों के संबंध में बातचीत कैसे करता है?
पत्रकारों की भनक लगते ही कार्यालय से बाहर निकल गया व्यक्ति: मंगलवार को कार्यालय में मौजूद लोगों से बातचीत और गतिविधियों की जानकारी लेने के दौरान जब पत्रकारों की सक्रियता बढ़ी तो संबंधित व्यक्ति वहां से बाहर निकल गया। इस पूरे घटनाक्रम ने कार्यालय के भीतर चल रही कथित दलाली व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कार्यालय के कुछ कर्मचारियों और बाहरी लोगों के बीच ऐसी समझ बनी हुई है, जिसके कारण आम लोगों को सीधे सरकारी प्रक्रिया से काम कराने में परेशानी होती है और उन्हें दलालों के माध्यम से काम कराने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
सीसीटीवी बंद रहने से बढ़ा संदेह 5: जिला परिवहन कार्यालय में निगरानी के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। मंगलवार को जिस समय कार्यालय में कथित तौर पर लाइसेंस और कागजात के नाम पर सौदेबाजी चल रही थी, उस दौरान सीसीटीवी बंद होने की बात सामने आई। यदि सरकारी कार्यालय में लगे निगरानी कैमरे नियमित रूप से बंद रहते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या कैमरे तकनीकी खराबी के कारण बंद थे या जानबूझकर उन्हें बंद रखा गया था? इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
सूत्रों के अनुसार, कार्यालय की कुछ फाइलों पर कथित रूप से ऐसे संक्षिप्त संकेत या ह्यकोडह्न लिखे जाते हैं, जिन्हें देखकर संबंधित कर्मचारी समझ जाते हैं कि फाइल किस माध्यम से आई है। यह भी आरोप है कि जिन लोगों ने अतिरिक्त रकम नहीं दी, उनकी फाइलों में कागजात की कमी या अन्य तकनीकी कारण बताकर उन्हें वापस कर दिया जाता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसा कोई नेटवर्क वास्तव में संचालित हो रहा है तो यह सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, लाइसेंस और वाहन संबंधी विभिन्न कार्यों के लिए कथित तौर पर अलग-अलग रकम तय होने की चर्चा है। आरोप है कि दोपहिया वाहनों से जुड़े कार्यों के
लिए कुछ हजार रुपये से लेकर तीनपहिया और चारपहिया वाहनों के लिए आठ-दस हजार रुपये तथा बड़े वाहनों के लिए 15 से 20 हजार रुपये तक की मांग किए जाने की शिकायतें हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह महज दलाली का मामला नहीं, बल्कि सरकारी कार्यालय में समानांतर आर्थिक व्यवस्था संचालित होने का गंभीर संकेत है। कार्यालय में प्रतिमाह बड़ी संख्या में लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन और अन्य वाहन संबंधी कार्य होने की बात कही जा रही है। आरोप है कि इन कार्यों के एवज में प्रति आवेदक औसतन कई हजार रुपये की अतिरिक्त रकम वसूली जाती है। इसी आधार पर कुछ लोगों द्वारा हर महीने करीब एक करोड़ रुपये तक की कथित अवैध वसूली का दावा किया जा रहा है। हालांकि इस रकम की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि इतनी बड़ी रकम का खेल चल रहा है तो इसका लाभ किस-किस स्तर तक पहुंच रहा है? क्या इसमें केवल दलाल शामिल हैं या विभागीय स्तर पर भी किसी की मिलीभगत है? इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। बताया जाता है कि करीब 12 वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी वंदना प्रेयसी के निरीक्षण के दौरान भी जिला परिवहन कार्यालय में महेश प्रसाद नामक व्यक्ति की कथित दलाली का मामला सामने आया था। उस समय जिलाधिकारी ने कार्यालय में उसकी मौजूदगी को लेकर नाराजगी जताई थी और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई थी।
यदि वही व्यक्ति वर्षों बाद फिर से कार्यालय में सक्रिय दिखाई दे रहा है, तो यह प्रशासनिक निगरानी और पूर्व कार्रवाई के असर पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
1. गैर सरकारी व्यक्ति को डीटीओ कार्यालय के भीतर नियमित रूप से बैठने की अनुमति किसने दी ?
2. यदि वह कर्मचारी नहीं है तो वह सरकारी फाइलों और आवेदकों के मामलों में दखल कैसे दे रहा है?
3. कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरे ड्यूटी के समय बंद क्यों थे ?
4. फाइलों पर कथित ह्यकोडह्न और दलालों के नेटवर्क की सच्चाई क्या है? हर महीने करोड़ों रुपये की कथित वसूली के आरोपों की स्वतंत्र जांच कब होगी?
जांच हुई तो कई चेहरे हो सकते हैं बेनकाबः जिला परिवहन कार्यालय में कथित दलाली और अतिरिक्त रकम की वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप गलत हैं तो विभाग को इसे स्पष्ट करना चाहिए और यदि इनमें जरा भी सच्चाई है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। सरकारी कार्यालय आम लोगों की सुविधा के लिए होते हैं, न कि किसी समानांतर दलाली व्यवस्था के संचालन के लिए। ऐसे में अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और परिवहन विभाग इन गंभीर आरोपों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या कार्यालय की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, फाइलों की जांच, कर्मचारियों की भूमिका तथा कथित दलालों की गतिविधियों की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाया जाता है। क्योंकि सवाल सिर्फ एक दलाल का नहीं है-सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसके बीच आम आदमी अपनी ही सरकार के कार्यालय में अपना काम कराने के लिए कथित तौर पर अतिरिक्त रकम देने को मजबूर होने का आरोप लगा रहा है।
