गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और बच्चों पर विशेष फोकस, स्वास्थ्य केंद्रों, विद्यालयों और समुदाय स्तर पर हो रही जांच
किशनगंज, 30 अगस्त।
थकान, कमजोरी, चक्कर या सांस फूलने जैसी शिकायतों को अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि कई बार ये शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी यानी एनीमिया के संकेत होते हैं। लंबे समय तक एनीमिया रहने से व्यक्ति की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। बच्चों में इसका असर शारीरिक एवं मानसिक विकास पर पड़ सकता है, जबकि गर्भवती महिलाओं में गंभीर एनीमिया मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। इसी चुनौती को देखते हुए बिहार में एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम के तहत 25 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। किशनगंज में भी अभियान पूरी सक्रियता के साथ जारी है।अभियान का उद्देश्य सिर्फ हीमोग्लोबिन की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि एनीमिया की पहचान के बाद लाभार्थी को आयरन-फोलिक एसिड, आवश्यक उपचार, पोषण संबंधी परामर्श और नियमित फॉलोअप से जोड़ना है। सदर अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, विद्यालयों और समुदाय स्तर तक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
कमजोरी को सामान्य मानना पड़ सकता है भारी
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ देवेंद्र कुमार ने कहा कि एनीमिया धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित कर सकता है। शुरुआत में थकान और कमजोरी जैसे सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हीमोग्लोबिन की कमी बढ़ने पर चक्कर, सांस फूलना और कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। गर्भावस्था में इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। इसलिए गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं, किशोरियों और बच्चों की समय पर जांच बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि लगातार कमजोरी या थकान को सामान्य मानकर स्वयं उपचार करने के बजाय हीमोग्लोबिन की जांच कराएं। समय पर पहचान और उपचार से एनीमिया को नियंत्रित किया जा सकता है।
सात लक्षित समूहों तक पहुंचेगी स्वास्थ्य टीम
अभियान के तहत सात प्रमुख लाभार्थी समूहों को लक्षित किया गया है। इनमें कम वजन के साथ जन्मे शिशु, 4 से 59 माह के बच्चे, 5 से 9 वर्ष के बच्चे, 10 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियां, 20 से 49 वर्ष की प्रजनन आयु की महिलाएं, गर्भवती और धात्री माताएं शामिल हैं।इन तक पहुंच बनाने में आशा कार्यकर्ता, ममता कार्यकर्ता, नर्स और जीविका दीदियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनके माध्यम से एनीमिया के लक्षण, संतुलित आहार, आयरन-फोलिक एसिड के सेवन और नियमित जांच के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा रही है।
जांच के बाद उपचार तक पहुंचाना मुख्य लक्ष्य
अभियान की खासियत यह है कि जांच में एनीमिया पाए जाने के बाद लाभार्थी को उसकी स्थिति के अनुसार उपचार से जोड़ा जाएगा। बच्चों, किशोर-किशोरियों, प्रजनन आयु की महिलाओं, गर्भवती एवं धात्री माताओं के लिए आयु और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण की व्यवस्था की गई है।मध्यम एवं गंभीर मामलों में चिकित्सकीय निगरानी और आवश्यक उपचार कराया जाएगा। जरूरत पड़ने पर गंभीर मरीजों को उच्च स्वास्थ्य संस्थान से भी जोड़ा जाएगा। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि जांच के बाद कोई लाभार्थी उपचार से वंचित न रहे।
अस्पताल से विद्यालय और पंचायत तक जांच
जिले के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में एनीमिया की जांच की जा रही है। जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और आयुष्मान आरोग्य मंदिर के साथ वीएचएसएनडी एवं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के सत्रों में भी जांच होगी।विद्यालयों में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के चलंत चिकित्सा दल सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बच्चों और किशोर-किशोरियों की जांच करेंगे। डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर से जांच कर जरूरत के अनुसार दवा और परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा।
पोषण और उपचार दोनों पर रहेगा जोर
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. देवेंद्र कुमार ने बताया कि एनीमिया से निपटने के लिए केवल आयरन की गोली देना पर्याप्त नहीं है। आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण के साथ कृमि प्रबंधन, संतुलित खान-पान, फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों के उपयोग और चिकित्सीय उपचार पर भी जोर दिया जा रहा है। उन्होंने लोगों से अपील की कि भोजन में आयरन युक्त स्थानीय खाद्य पदार्थों को शामिल करें और स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह के अनुसार दवाओं का नियमित सेवन करें।
लक्षण दिखें तो तुरंत कराएं जांच
जिला पदाधिकारी नवीन कुमार ने कहा कि एनीमिया को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरियों में समय पर इसकी पहचान जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों एवं स्वास्थ्यकर्मियों को निर्देश दिया कि जांच में चिन्हित प्रत्येक लाभार्थी को उपचार से जोड़ा जाए और मध्यम एवं गंभीर मामलों की नियमित निगरानी हो।उन्होंने आम लोगों से अपील की कि लगातार कमजोरी, थकान, चक्कर या सांस फूलने जैसी समस्या हो तो नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर हीमोग्लोबिन की जांच अवश्य कराएं। गर्भवती महिलाएं नियमित प्रसवपूर्व जांच कराएं और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार आयरन-फोलिक एसिड की दवा लें।
परिवार की भागीदारी भी जरूरी
सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने कहा कि एनीमिया के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए जांच, उपचार, पोषण और फॉलोअप को साथ लेकर चलना जरूरी है। उन्होंने अपील की कि आयरन-फोलिक एसिड की दवा लेने में लापरवाही न बरतें और भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल, चना, गुड़ तथा अन्य पोषक खाद्य पदार्थ शामिल करें।उन्होंने कहा कि एनीमिया से बचाव केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार और समुदाय की जागरूकता एवं भागीदारी से ही अभियान को स्थायी सफलता मिल सकती है।
30 नवंबर तक चलेगा अभियान
25 अगस्त से शुरू हुआ विशेष अभियान 30 नवंबर 2026 तक चलेगा। इस दौरान लक्षित लाभार्थियों की पहचान, हीमोग्लोबिन जांच, उपचार, पोषण संबंधी परामर्श और फॉलोअप पर लगातार जोर रहेगा। अभियान का लक्ष्य केवल अधिक से अधिक जांच करना नहीं, बल्कि एनीमिया की पहचान के बाद प्रत्येक जरूरतमंद व्यक्ति को उपचार तक पहुंचाना और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है।
