विडम्बना:- शिक्षा के नाम पर क्षल, PMOPG पर शिकायत का अनुचित निस्तारण, परेशान छात्र ने भिजवाया प्रधानमंत्री को वकालतन नोटिस
रिपोर्ट – अमित कुमार भागलपुर/बिहार ।
PMOPG पोर्टल जिसकी शुरुआत वर्ष 2007 में डॉक्टर मनमोहन सिंह जी के प्रधानमंत्रित्व काल में आमजनमानस की समस्या को कम समय में निपटाते हुए अदालतों के बोझ को कम करने के आशय से किया गया था लेकिन वर्तमान समय में अगर देखा जाए तो मोदीराज में यह पोर्टल जनता के लिए सरदर्द और इंसाफ के नाम पर गुमराह करने का जरिया बनता प्रतीत हो रहा है।
एक छात्र जो कि बिहार से हरियाणा उच्चशिक्षा के आस लिए प्रवास करता है और वर्ष 2021 में गुरुग्राम जिले के बिनोला ग्राम स्थित स्टारेक्स यूनिवर्सिटी नामक निजी विश्वविद्यालय में पीएचडी सत्र 2020-23 में नामांकन लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावली के अनुरूप कोर्सवर्क पूरा करता है। छात्र जोकि बिहार प्रदेश के मुंगेर जिले का स्थाई निवासी और एक सामाजिक कार्यकर्ता भी है जो कि अपनी शालीनता और सौम्यता के लिए क्षेत्र में प्रख्यात भी है। पीएचडी नियमावली के अनुरूप कोर्स वर्क पूरा करने के पश्चात यह जिम्मेदारी संबंधित संस्थान की होती है की छात्र को उसके विषयवस्तु के अनुरूप शोध मार्गदर्शन के लिए उक्त विषय का उपयुक्त गाइड आवंटित करें और डॉक्टर भूपेंद्र बहादुर तिवारी नामक एक गाइड को छात्र शशांक रंजन के शोध मार्गदर्शक के रूप में नामित किया गया। छात्र शशांक रंजन ने डॉक्टर भूपेंद्र बहादुर तिवारी जी के मार्गदर्शन में अपने शोध का शीर्षक तय करते हुए शोध प्रारूप तैयार किया और प्रस्तुतीकरण की तैयारी में लगा हुआ था। विदित हो कि डॉक्टर भूपेंद्र बहादुर तिवारी जी स्टारेक्स यूनिवर्सिटी से किसी कारणवश संबंध विच्छेद कर अन्यत्र चले गए ऐसे समय में शोध छात्र के रूप में शशांक रंजन अनाथ हो चुका था क्योंकि तब स्टारेक्स यूनिवर्सिटी में छात्र शशांक रंजन के विषय वस्तु का कोई भी गाइड नहीं रह गए जिनके मार्गदर्शन में वह अपना शोध कार्य को आगे बढ़ा सके। ऐसे समय में स्टारेक्स यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने महज अपने तरफ से गाइड आवंटन को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावली के विरुद्ध जाकर खानापूर्ति करने का कार्य किया और गाइड के रूप में मार्केटिंग की एक महिला पीएचडी होल्डर जो कि उस समय यूजीसी के नियमावली के अनुरूप अपने क्षेत्र में भी किसी शोधकार्य के मार्गदर्शन के लिए पात्र नहीं थी क्योंकि तब यूजीसी की नियमावली पीएचडी के पूरे होने के बाद 5 साल का शैक्षणिक अनुभव और संबंधित क्षेत्र में कुछ शोधपत्रों के प्रकाशित होने की न्यूनतम आहर्ता को इंगित करता था उन्हें शशांक रंजन के फाइनेंस विषय के शोध के लिए नियुक्त किया गया। विश्वविद्यालय में शोध निर्देशक के रूप में नियुक्त डॉक्टर मनोज कुमार से मिलकर जब छात्र ने यह कहा कि डॉक्टर नीलम खन्ना जिनके पास उनके विषय वस्तु में प्रवीणता ही नहीं है और ना ही वे गाइड बनने के लिए UGC की नियमावली के अनुरूप पात्र हैं फिर उन्हें क्यों उसके पीएचडी के लिए गाइड नियुक्त किया गया है उसे उसके विषय वस्तु का गाइड आवंटित किया जाए ताकि वह निर्वाध रूप से अपने शोधकार्य को सफलतापूर्वक कर सके। छात्र द्वारा कथित तथ्यों से अवगत होने के पश्चात डीन रिसर्च डॉक्टर मनोज कुमार ने छात्र को फटकार लगाते हुए कहा कि एक छात्र होकर तुम यह कैसे कह सकते हो कि डॉक्टर नीलम खन्ना एक्सपर्ट नहीं है और फिलहाल हमारे संस्थान में तुम्हारे विषय वस्तु का गाइड नहीं है और जब तक तुम्हारे विषय वस्तु का गाइड नहीं आ जाता है तबतक डॉक्टर नीलम खन्ना के मार्गदर्शन में ही काम करो अर्थात वह जैसा कहती है वैसा ही करो। छात्र डॉक्टर नीलम खन्ना के संपर्क में आया और तब तक के तथ्यों से अवगत करवाते हुए अपने शोध प्रारूप को दिखाया और प्रस्तुतिकरण के लिए आग्रह किया तो उनके शोध प्रारूप को एक्सपर्ट कमेटी गठित करवाते हुए अग्रसर करवाकर उन्हें पंजीकरण प्रदान करवा दिया जाए। छात्र की बातों को सुनकर डॉक्टर नीलम खन्ना ने शोध प्रारूप को देखा और एक फॉर्मेट देकर छात्र से शोध प्रारूप को इस फॉर्मेट में तैयार करके लाने का निर्देश देते हुए कहा कि ऐसे लेकर आओ उसके बाद पंजीयन की प्रक्रिया पूरी करवा देने का आश्वासन भी दिया। छात्र ने अगली तारीख पर दिए गए फॉर्मेट में अपने शोध प्रारूप को ढाल कर दिखाया तो डॉक्टर नीलम खन्ना ने यह कहते हुए छात्र द्वारा निर्मित शोध प्रारूप के फॉर्मेट को खारिज कर दिया कि यह उनका बताया हुआ फॉर्मेट नहीं है और पुनः उन्होंने एक नया फॉर्मेट देकर अगली मुलाकात की तिथि तय कर दिया और इस प्रकार से छात्र को परेशान करते हुए अपने महिला होने का अनैतिक लाभ लेते हुए एक छात्र का लगातार चार महीने तक सिर्फ फॉर्मेट बदलवाकर छात्र के भविष्य से खिलवाड़ और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया साथ ही साथ विश्वविद्यालय प्रबंधन में उच्चपदस्थ कर्मियों को छात्र के विरुद्ध भड़काने का भी काम किया कि छात्र शशांक रंजन उसके द्वारा निर्देशित कार्यों को करके ही नहीं लाता है। डॉ नीलम खन्ना के हरकतों से परेशान छात्र ने उनसे उनके ही द्वारा लिखकर फॉर्मेट प्रदान करने की मांग किया ताकि अगली मुलाकात में उन्हें कोई शिकायत ना रह जाए। डॉ नीलम खन्ना ने जब छात्र को स्वलिखित फॉर्मेट प्रदान किया तो डॉक्टर नीलम खन्ना ने Methodology को Meathology, Shodhganga को Shodganga और Shodhgangotri को Shodgangatori लिखा जो की डीन रिसर्च डॉक्टर मनोज कुमार के सवालों का जवाब देता हुआ प्रमाण है कि डॉक्टर नीलम खन्ना कितनी बड़ी एक्सपर्ट है। अगली मुलाकात में जब छात्र शशांक रंजन द्वारा उक्त फॉर्मेट में शोध प्रारूप प्रस्तुत किया गया तब अपने हौसले से बुलंद डॉक्टर नीलम खन्ना ने पुनः नारा लगाया कि मैं बताती हूं और तुम करके ही नहीं लाते हो ऐसे नहीं बताए थे और पुनः छात्र शशांक रंजन को एक नया फॉर्मेट देने का प्रयास प्रारंभ भी किया लेकिन तभी छात्र ने उनके लिखित फॉर्मेट को उन्हें दिखाकर निरुत्तर कर दिया और इससे आहत डॉक्टर नीलम खन्ना ने अपने मूर्खता का परिचय देते हुए छात्र से कहा कि शोध प्रारूप में एब्स्ट्रेक्ट, हाइपोथेसिस और स्टैटिकल टूल का होना आवश्यक नहीं है अतः इसे हटा दो और शोध प्रारूप में क्वेश्चनायर को सम्मिलित करके लाओ। जब छात्र शशांक रंजन ने यह सवाल डॉक्टर नीलम खन्ना से किया कि यह क्वेश्चनायर का निर्माण कैसे होता है तो इस पर डॉक्टर नीलम खन्ना ने जवाब देते हुए कहा कि पहले बनाकर लाओ फिर बात करूंगी। ध्यातव्य हो कि शोध प्रारूप में एब्स्ट्रेक्ट, हाइपोथेसिस और स्टैटिकल टूल सभी आवश्यक होते हैं जबकि क्वेश्चनायर थीसिस का अंतिम अभिन्न अंग होता है जिसके लिए शोध नियमावली और यूजीसी की व्यवस्था के द्वारा ही कम से कम 2 वर्षों का समय आवंटित है और यह यदि एक प्रकार से कहा जाए तो डॉक्टर नीलम खन्ना द्वारा चंद दिनों में तैयार करने का छात्र पर दबाव बनाया जाना एक प्रकार से मानसिक रूप से छात्र को प्रताड़ित करने के समान है जिसमें डीन रिसर्च डॉक्टर मनोज कुमार की भी सहमति दी गई थी कि क्वेश्चनायर बनाओ। इसी बीच छात्र को डॉक्टर नीलम खन्ना द्वारा एक को-गाइड नियुक्त करते हुए अपने शोध कार्य को आगे बढ़ने का सलाह देकर ईमेल द्वारा प्रक्रिया भी पूरी करवाई गई जिसे तब के विभागाध्यक्ष डॉक्टर आशीष कुमार व डीन रिसर्च डॉक्टर मनोज कुमार द्वारा यह कहते हुए सिरे से खारिज कर दिया गया कि को-गाइड की नियुक्ति की प्रक्रिया ईमेल के माध्यम से पूरी नहीं की जा सकती है और कोई भी सेवानिवृत व्यक्ति किसी प्रकार से को-गाइड नहीं हो सकता है। अगर इस हरकतों को देखा जाए तो एक प्रकार से छात्र का सामूहिक रूप से मानसिक प्रताड़ना का प्रमाण है। छात्र के बार-बार आग्रह करने के पश्चात जब लगभग 13 महीने बीत चुके थे तब डॉक्टर नीलम खन्ना ने छात्र को आंतरिक प्रस्तुतीकरण के लिए अनुमति प्रदान किया और दिनांक 2 दिसंबर 2022 को विश्वविद्यालय परिसर में आमंत्रित किया और नाटकीय ढंग से अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर पूरी शोध प्रारूप को गलत करार देते हुए पुनर्निर्माण अथवा टॉपिक बदलकर फाइनेंस के क्षेत्र को छोड़कर HRM या मार्केटिंग में पीएचडी करने का दबाव बनाया जो की छात्र के मौलिक अधिकारों का हनन व विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा सामूहिक रूप से किया गया मानसिक प्रताड़ना का विषय है। छात्र उपरोक्त घटनाओं को सहन करते हुए अवकाश की भी गुहार लगाई कि उन्हें सीएमसी वेल्लोर जाकर अपना रूटीन चेकअप करवाने की आवश्यकता है अतः उन्हें कुछ दिनों का अवकाश दिया जाए जिस पर डॉक्टर नीलम खन्ना ने कहा कि या तो पीएचडी करो या अपना इलाज करवाओ जोकि एक प्रकार से डॉक्टर नीलम खन्ना के द्वारा किया गया सामाजिक अपराध भी है। छात्र ने दिनांक 5 दिसंबर 2022 को सीएमसी वेल्लोर का अपॉइंटमेंट ले रखा था जिसका नंबर 977060P है जिससे डॉक्टर नीलम खन्ना को अवगत करवाया जा चुका था फिर भी महज एक छात्र के शैक्षणिक व निजी जीवन से खिलवाड़ करने हेतु इरादतन 2 दिसंबर 2022 को विश्वविद्यालय बुलाकर नाटकीय घटना को अंजाम दिया गया जिससे ना तो छात्र का पीएचडी कार्य अग्रसर हुआ और ना ही स्वास्थ्य लाभ मिल पाया। छात्र ने पुनः आग्रह किया कि उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार ना करते हुए उन्हें पंजीयन प्रदान करवा दिया जाए ताकि वह अपना आगे का शोध कार्य शीघ्र पूरा कर सके इसके पश्चात डॉक्टर नीलम खन्ना ने छात्र शशांक रंजन को माह दिसंबर 2022 में ही अंतिम रूप से प्रस्तुतीकरण करवाते हुए पंजीयन प्रदान करवाने का आश्वासन दिया। छात्र ने डॉक्टर नीलम खन्ना के व्यवहारों से आहत होकर दिनांक 21 दिसंबर 2022 को दिन रिसर्च डॉक्टर मनोज कुमार को आवेदन देकर उनसे गाइड बदलने की मांग किया जो कि परिणामस्वरुप शून्य रहा। छात्र ने इस आशा में कि डॉक्टर नीलम खन्ना ने माह दिसंबर 2022 में ही पंजीयन का आश्वासन दिया है तो देर सवेर 15 जनवरी 2023 तक भी अगर करवा दिया जाता है तो वह एक बार के लिए अपना स्वास्थ्य जांच करवा पाएगा और अपना वेलौर जाने का रेल टिकट पीएनआर संख्या 2453271142 के साथ दिनांक 24 जनवरी 2023 का लिया और डॉक्टर नीलम खन्ना को अवगत करवा दिया लेकिन डॉक्टर नीलम खन्ना अपने मजबूत इरादे में बुलंद प्रस्तुतीकरण को टालते हुए पहले दिनांक 20 जनवरी 2023 को रखा और पुनः तारीख बदलकर दिनांक 27 जनवरी 2023 करते हुए दिनांक 20 जनवरी 2023 को छात्र को वैरंग लौटा दिया। छात्र इससे आहत होकर ऐसे विश्वविद्यालय के विरुद्ध आवाज उठाते हुए अपने कुछ साथियों को गोलबंद करते हुए मामले को पीएमओपीजी पोर्टल के माध्यम से सरकार के संज्ञान में लाकर सुलझाने की पहल करते हुए मामले का संक्षिप्त विवरण तैयार कर अपने साथियों से साझा किया जिसमें से किसी छात्र ने डॉक्टर नीलम खन्ना को मामले से अवगत करवा दिया और डॉक्टर नीलम खन्ना द्वारा मामले से डॉक्टर आशीष कुमार व डॉक्टर मनोज कुमार को अवगत करवा दिया गया। छात्र अपने स्वास्थ्य को दरकिनार करते हुए टिकट कैंसिल कर पीएचडी की आस लिए जब दिनांक 27 जनवरी 2023 को विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हुआ तो वहां गाइड डॉक्टर नीलम खन्ना (मार्केटिंग), डॉ प्रियंका (गैर-फाइनेंस), डॉ मनोज कुमार (फिजिक्स), व डॉक्टर मनोज कुमार के अधीन पीएचडी कर रहे दो फिजिक्स के शोधार्थी ने एक फाइनेंस के शोधार्थी शशांक रंजन का प्रस्तुतीकरण लेते हुए छात्र के द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक तथ्य को गलत करार देते हुए मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का काम किया और यूजीसी की नियमावली की भी धज्जियां उड़ाया। और अंत में शोध प्रारूप को अमान्य करार देते हुए ऐसे समिति जिसमें छात्र के विषय का एक भी पीएचडी होल्डर नहीं थे सभी सदस्यों ने स्वयं को महान सिद्ध करने का प्रयास किया। दिनांक 27 जनवरी 2023 का प्रस्तुतीकरण रूपी नाटकीय घटनाक्रम की समाप्ति के पश्चात जब छात्र निराश होकर वापसी की तैयारी कर रहा था तभी विभागाध्यक्ष डॉ आशीष कुमार व डॉक्टर मनोज कुमार ने छात्र को रोकते हुए कहा कि तुम्हें अभी हमारे साथ कुलपति कक्ष चलना है वहां एक आवश्यक कार्य हेतु तुम्हारा आना आवश्यक है। छात्र अपने गुरुद्वय यथा डॉक्टर मनोज कुमार व डॉक्टर आशीष कुमार के साथ कुलपति कक्ष की ओर प्रस्थान किया जहां रास्ते में डॉक्टर आशीष कुमार ने छात्र द्वारा साथियों के साथ साझा किए गए पत्र की चर्चा किया और कुलपति कक्ष ले जाने के क्रम में अवगत करवाया। छात्र जब डॉक्टर मनोज कुमार व डॉक्टर आशीष कुमार के साथ दिनांक 27 जनवरी 2023 को कुलपति कक्ष में प्रवेश किया तो पाया कि कुलपति के आसन पर प्रतिकुलपति डॉक्टर अशोक दिवाकर जी आसीन थे जिनके कुलपति के रूप में पदासीन होने को लेकर विवाद भी है जो की गुरुग्राम के जिला न्यायालय में वाद संख्या HRGR010084282024 व HRGR031256442023 के रूप में लंबित है। छात्र शशांक रंजन से सामना होते ही डॉक्टर मनोज कुमार व डॉक्टर आशीष कुमार के संयुक्त तत्वाधान में कुलपति के आसन पर पदासीन डॉक्टर अशोक दिवाकर को यह कहा गया की छात्र शशांक रंजन का अभी-अभी प्रस्तुतीकरण लेकर आ रहा हूं और इसका ज्ञान बिल्कुल शून्य है फिर भी यह छात्र यहां की व्यवस्था के विरुद्ध जांच की बात करते हुए शासन के संज्ञान में लाने की योजना बना रहा है। इतना सुनते ही डॉक्टर अशोक दिवाकर ने छात्र पर चिल्लाते हुए कहा कि “क्या रे सीबीआई जांच करवायेगा सीबीआई वाले तुमको क्या मुझसे ज्यादा जानते हैं हम तो कहते हैं कि तुम वह पत्र शासन तक पहुंचाओ फिर देखो तुम्हारे साथ क्या होता है” उसके बाद डॉक्टर मनोज कुमार व डॉक्टर आशीष कुमार ने संयुक्त रूप से कहा कि तुम वह पत्र शासन को भेज कर देख लो देखो फिर तुम्हारा क्या होता है। डॉ अशोक दिवाकर ने पुनः डॉक्टर मनोज कुमार व डॉक्टर आशीष कुमार को संबोधित करते हुए कहा कि बिनोला के SHO को बुलाकर छात्र शशांक रंजन पर मानहानि का FIR करो। उक्त घटना के बाद डॉक्टर आशीष कुमार व डॉक्टर मनोज कुमार ने छात्र शशांक रंजन को रिसर्च व इनोवेशन सेल में जाकर उन दोनों के आगमन की प्रतीक्षा करने का निर्देश तथा मुख्य द्वार से छात्र शशांक रंजन को बाहर न निकलने देने का निर्देश दरवानों को फोन कर डॉक्टर आशीष कुमार द्वारा दिया गया। छात्र शशांक रंजन कुलपति कक्ष से निकलकर रिसर्च व इनोवेशन सेल में बैठकर प्रतीक्षा करने लगा जहां कि पूर्व से प्रचंड विद्वान महिला डॉक्टर नीलम खन्ना उपस्थित थी। लगभग आधे घंटे की प्रतीक्षा के पश्चात डॉक्टर आशीष कुमार व डॉक्टर मनोज कुमार रिसर्च व इनोवेशन सेल में पधारकर छात्र शशांक रंजन पर माफीनामा लिखने का दबाव बनाया जिससे छात्र शशांक रंजन ने इनकार किया तो महानुभाव द्वय द्वारा छात्र को झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दिया गया और कहा कि अगर माफीनामा लिखित में नहीं दोगे और अपने नामांकन को रद्द करवाकर इस परिसर के परित्याग में आनाकानी करोगे तो ऐसे मुकदमे में फंसाऊंगा कि जिंदगी जेल में बीत जाएगी और बाहरी दुनिया को देखने के लिए तरस जाओगे अगर करोड़ों रुपए खर्च करके इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी बनवाया गया है तो हम लोगों की इतनी पहुंचे तो जरूर है कि तुम्हें ऐसी पुलिसिया मार परवाऊंगा कि जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाओगे। फिर भी छात्र ने विरोध किया और ना चाहते हुए भी अपनी जिंदगी की सुरक्षा व भविष्य की चिंता में आकर छात्र ने माफीनामा लिखकर दे दिया छात्र को डॉक्टर आशीष कुमार ने दिनांक 28 जनवरी 2023 को विश्वविद्यालय बुलाकर कुलपति डॉक्टर अशोक दिवाकर से मिलकर पुनः माफी मांगने के लिए दबाव दिया और छात्र से मिलकर डॉक्टर अशोक दिवाकर से कहा कि दो दिनों के अंदर अपने पिता को बुलाकर मुझसे मिलवाओ। इसके बाद छात्र ने दिनांक 30 जनवरी 2023 को अपने पिता को बुलाकर कुलपति डॉ अशोक दिवाकर जी से मिलवाया जहां डॉक्टर अशोक दिवाकर जी ने छात्र के पिता को डांटते हुए छात्र को मुकदमे में फसाने की धमकी दी और अपमानित करते हुए भगा दिया। इसके बाद कभी डॉक्टर आशीष कुमार तो कभी डॉक्टर मनोज कुमार द्वारा छात्र शशांक रंजन के साथ अनैतिक व्यवहार करते हुए बार-बार डॉक्टर अशोक दिवाकर के समक्ष जाकर माफी मांगने के लिए विवश किया गया। दिनांक 10 फरवरी 2023 को छात्र शशांक रंजन को पुनः डॉक्टर मनोज कुमार द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में बुलाकर नामांकन रद्द करवाने का दबाव बनाया गया। भयाक्रांत छात्र ने स्टारेक्स यूनिवर्सिटी प्रबंधन के समक्ष अपनी नामांकन रद्द करवाने का प्रस्ताव रखते हुए सभी आवश्यक प्रक्रिया को पूरा कर दिया और विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा आवश्यक दस्तावेज देकर छात्र को बिना सुरक्षित राशि लौट आए वापस लौट के लिए विवश कर दिया। जबकि छात्र के साथ हुए अनैतिकता के विरुद्ध छात्र का अधिकार बनता है कि विश्वविद्यालय को भुगतान किए गए समस्त धनराशि (दो लाख इकतीस हजार रुपए) के साथ-साथ क्षतिपूर्ति भी प्राप्त करें क्योंकि यहां पर विश्वविद्यालय प्रबंधन पूरी तरह से दोषी है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन यूजीसी के नियमावली के अनुरूप छात्र को उसके विषय वस्तु का गाइड आवंटित करने में असफल रहा जिसे लेकर यह कहना गलत नहीं होगा कि विश्वविद्यालय प्रबंधन छात्र के साथ मूल व्यवहारों को स्थापित करने में ही असफल रहा और अपनी कमियों से छात्र का समय धन व भविष्य नष्ट किया। इस ठगी और धोखाधड़ी से आहत छात्र शशांक रंजन ने पहले अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवाकर अपने शारीरिक व्याधि के निष्पादन को पूरा किया और स्वस्थ होने के पश्चात मामले को सारांशित रूप से पीएमओपीजी पोर्टल पर उठाकर मामले में इंसाफ की गुहार लगाया जिसकी पंजीयन संख्या PMOPG/E/2023/0080143 है जिसके आलोक में विश्वविद्यालय प्रबंधन ने पूर्व में वर्णित माफीनामा को संलग्न करते हुए कहा कि “मामले को पूर्व में ही छात्र व विश्वविद्यालय द्वारा आपसी सामंजस्य से सुलझा लिया गया है और इस आशय से छात्र द्वारा प्राप्त पत्र आपकी जानकारी के लिए संलग्न किया जा रहा है”। मामले को यूजीसी द्वारा बंद कर दिया गया और उसे संलग्न पत्र को वाद पोर्टल पर डालते हुए सार्वजनिक करने से परहेज किया गया।
छात्र द्वारा पुनः एक वाद प्रस्तुत करते हुए यह गुहार लगाया गया कि उसके और विश्वविद्यालय प्रबंधन के बीच किस प्रकार का समझौता हुआ है वह उससे अवगत होना चाहता है अतः संलग्न पत्र की प्रति उसे उपलब्ध करवाया जाए जिसका की वाद संख्या DARPG/E/2023/0020607 है जिसे यूजीसी के महानुभावों द्वारा स्टारेक्स यूनिवर्सिटी को भेजकर कार्रवाई का निर्देश दिया गया जिस पर स्टारेक्स यूनिवर्सिटी की ओर से कोई संज्ञान नहीं लिया गया। छात्र ने पुनः वाद संख्या DSEHE/E/2023/0007509 प्रस्तुत किया और उक्त पत्र की मांग किया जिसे आपसी सहमति का आधार बनाया गया था लेकिन यूजीसी द्वारा पत्र को छात्र से साझा करने के बजाय मामले को हरियाणा राज्य सरकार के पास भेज दिया गया यह कहते हुए कि विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि मामला सुलझा लिया गया है लेकिन छात्र इस एक्शन से संतुष्ट नहीं है।
छात्र में हार ना मानते हुए पुनः वाद संख्या DSEHE/E/2024/0001969 प्रस्तुत करते हुए उसे पत्र की मांग किया कि वह अवगत होना चाहता है कि उसके साथ कैसा समझौता हुआ है तो यूजीसी द्वारा पत्र को साझा कर दिया गया इस पर छात्र ने आपत्ति किया कि प्रस्तुत वाद और संलग्न पत्र का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किस रूप से संबंध है जिसे पुनः यूजीसी द्वारा यह कहते हुए निस्तारित कर दिया गया कि मामला संबंधित राज्य सरकार को भेज दिया गया है। छात्र में कुछ दिनों की प्रतीक्षा के उपरांत पुनः वाद संख्या DSEHE/E/2024/0004943 प्रस्तुत करते हुए पूर्व के बातों की विवेचना करते हुए मामले में संज्ञान लेने की गुहार लगाया जिसके विरुद्ध स्टारेक्स यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदत्त पत्र संख्या SU/Reg/UGC/2024/477 का सहारा लेते हुए बंद कर दिया गया। बताते चलें कि जो पत्र संख्या SU/Reg/UGC/2024/477 स्टारेक्स यूनिवर्सिटी की ओर से छात्र द्वारा लगाए जा रहे आरोपों का खंडन करते हुए यूजीसी को प्रेषित किया गया और यूजीसी द्वारा छात्र को भेज कर वाद संख्या DSEHE/E/2024/0004943 को बंद कर दिया। उस पत्र संख्या SU/Reg/UGC/2024/477 का बिंदुवार विवेचना करते हुए साक्ष्य सहित छात्र ने वाद संख्या DSEHE/E/2024/0007106 प्रस्तुत किया जिसके आलोक में यूजीसी ने पुनः उसी पत्र संख्या SU/Reg/UGC/2024/477 को संलग्न करते हुए बंद कर दिया जिसका विरोध करते हुए छात्र ने अपील संख्या DSEHE/E/A/2024/0002020 दर्ज किया जिस पर की यूजीसी के पक्षपाती कर्मचारी आर आई एस भारद्वाज ने दिनांक 24 दिसंबर 2024 को स्टारेक्स यूनिवर्सिटी के बचाव को अंजाम देने के आशय से छात्र को कारण बताओं नोटिस जारी कर दिया यह कहते हुए कि आपने बिना कोई कारण बताए अपील किया है जबकि यूनिवर्सिटी ने आपको बिंदुवार प्रतिक्रिया देते हुए अपना रूख स्पष्ट किया है लेकिन आपने यह नहीं बताया कि आपको क्यों और कैसे विश्वविद्यालय प्रबंधन की प्रतिक्रिया स्वीकार नहीं है अतः आप विंदुवार रूप से अपनी बातों को प्रस्तुत करते हुए प्रतिउत्तर करें। जिस पर छात्र ने प्रतिउत्तर करते हुए वाद संख्या DSEHE/E/2024/0007601 की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया कि आप जिस प्रकार से जवाब मांग रहे हैं जवाब उसी प्रकार से पूर्व से आपके रिकॉर्ड में संरक्षित है अतः आप विंदुवार प्रतिक्रिया वहां से देखकर उचित कार्रवाई की दिशा में अग्रसर होने की कृपा करें। लेकिन संबंधित पदाधिकारी ने मामले को पुनः दबाते हुए छात्र के प्रतिउत्तर को दरकिनार कर दिया। छात्र ने मामले को लेकर आरटीआई का भी सहारा लिया [(UGCOM/R/E/25/01363) व PMOIN/R/E/25/01653)] लेकिन संबंधित कर्मचारियों द्वारा मामले को गोल-मटोल व भटकावपूर्ण जवाब देकर निस्तारित कर दिया गया। पुनः छात्र ने दिनांक 13 जून 2025 को PMOPG/E/2025/0083201 लाकर मामले को सारांशित रूप से प्रस्तुत किया लेकिन स्टारेक्स यूनिवर्सिटी से लगाव ने कर्मचारियों को वाद निस्तारण में छात्र के अधिकारों व हितों को कुचलते हुए वाद को निस्तारित कर दिया जिससे आहत छात्र ने PMOPG पोर्टल को बंद करने का गुहार लगाते हुए एक पत्र प्रधानमंत्री को भेजा है जिसे उनके कार्यालय द्वारा वाद संख्या PMOPG/D/2025/0171625 में दिनांक 11 सितंबर 2025 को परिवर्तित कर उचित कार्रवाई के लिए भेजा गया लेकिन बातें ढ़ाक के तीन पात वाली सिद्ध होती दिख रही है। अंततः छात्र ने परेशान होकर अपने अधिवक्ता के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री को लीगल नोटिस भेजते हुए सभी बातों का संक्षित विवरण देकर अंतिम चेतावनी देते हुए इन्साफ की मांग किया है। अब देखने योग्य बात है कि छात्र के हितों की रक्षा हो पाती है या स्टारेक्स यूनिवर्सिटी को पुनः अनैतिक संरक्षण प्रदान की जाती है। ध्यातव्य हो कि छात्र द्वारा प्रस्तुत सभी वाद की सत्यता की परख वाद संख्या तथा छात्र का मोबाइल नंबर 9717232343 डालकर ऑनलाइन पोर्टल पर देखा जा सकता है और यह भी अध्ययन करते हुए मंथन किया जा सकता है की छात्र को गलत सिद्ध करने के लिए किस प्रकार से विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा झूठे और मनगढंत दलील प्रस्तुत किए गए हैं और यूजीसी के पक्षपाती कर्मचारियों द्वारा साजिश रचकर शिक्षा के नाम पर संचालित लूट के अड्डे को संरक्षित किया जा रहा है।
