तच को दबाने की लाख कोशिशें क्यों न की जाएं, लेकिन झूठ के महत की जनता हर चाल और हर सियासत को भली-भाँति समक्ष नींव एक दिन जरूर हिलती है।
संवाददाता शुभम कुमार भागलपुर/ बिहार
तच को दबाने की लाख कोशिशें क्यों न की जाएं, लेकिन झूठ के महत की जनता हर चाल और हर सियासत को भली-भाँति समक्ष नींव एक दिन जरूर हिलती है। आज देश की जागरूक राष्ट्र के नाम संबोधन के नाम पर जो प्रस्तुत किया गया, वह न केवल परंपराओं के विरुद्ध था, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा के साथ खुता दुरुपयोग भी था।
देश ने हमेशा देखा है कि जब भी प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो उसके पीछे कोई गंभीर कारण होता है-किसी संकट की घड़ी कोई बड़ी उपलब्धि या राष्ट्रहित का विषय। लेकिन इस बार सरकारी मंच और संसाधनों का उपयोग कर विपक्ष पर सीधा हमला किया गया, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। यदि उद्देश्य केवल राजनीतिक भाषण देना था, तो उसे ‘राष्ट्र के नाम संदेश” का स्वरूप क्यों दिया गया?
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि पूरा संबोधन तथ्यों से अधिक आरोपों, दोहराव और भटकाव से भरा हुआ था। देश को दिशा देने के बजाय भ्रमित करने का प्रयास किया गया। महिलाओं के आरक्षण का विधेयक 20 सितंबर 2023 को ही पारित हो चुका है, फिर भी नए सिरे से इसका नैरेटिव गढ़ना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह महिलाओं को अधिकार देने की सच्ची मंशा है, या फिर चुनाव से पहले भावनात्मक माहौल तैपार करने की रणनीति?
आज देश की महिलाएं जागरूक है। वे अब केवल वादों और नारों से प्रभावित नहीं होतीं, बल्कि ठोस निर्णय और वास्तविक कार्य देखना चाहती हैं। नारी सम्मान केवल भाषणों तक सीमित क्यों रह गया है? 50% आबादी को 50% भागीदारी देने में हिचकिचाहट करने में डर क्यों? क्यों है। 543 लोकसभा सीटों में महिलाओं को बराबर प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता? सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण लागू
यदि वास्तव में महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण की बात की जा रही है, तो क्या देश के सर्वोच्च पदों- प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री पर महिलाओं को अवसर देने का साहस दिखाया जाएगा। 20 से अधिक राज्यों में सरकार होने के बावजूद कितने राज्यों में महिला मुख्यमंत्री बनाई गई हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, उन जनप्रतिनिधियों पर अब तक कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की गई, जिन पर महित्ता उत्पीडन जैसे गंभीर आरोप लगे हैं?
Delimitation की आड़ लेकर महिला आरक्षण को टालना किसी नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से राजनीति प्रतीत होती है। तोकतंत्र में पहले मौजूदा ढांचे के भीतर समान अधिकार दिए जाते हैं, उसके बाद विस्तार की बात होती है।
यह भी स्पष्ट है कि चुनावी राज्यों को ध्यान में रखकर महिलाओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। यह एक ऐसी रणनीति है, जिसमें परिणाम चाहे जो भी हो, राजनीतिक लाभ दोनों परिस्थितियों में लेने की तैयारी रहती है। लेकिन यह और किसी भ्रम में आने वाली नहीं हैं। समझना जरूरी है कि देश की महिलाएं न केवल सशक्त हैं, बल्कि बेहद समझदार भी हैं। वे हर राजनीतिक चाल को पहचानती हैं
मेरा स्पष्ट मानना है कि देश को अब भाषणों की चमक नहीं, बल्कि कार्यों की सच्चाई चाहिए। जुमलों और दिखावे का दौर समाप्त हो चुका है-अब समय है जवाबदेही का, पारदर्शिता का और वास्तविक जनहित में निर्णय लेने का।
