बिहार कृषि महाविद्यालयए सबौर में बीएमजीएफ परियोजना के तहत जलवायु.अनुकूल धान पर प्रशिक्षण व इनपुट वितरण कार्यक्रम आयोजित।

बिहार कृषि महाविद्यालयए सबौर में बीएमजीएफ परियोजना के तहत जलवायु.अनुकूल धान पर प्रशिक्षण व इनपुट वितरण कार्यक्रम आयोजित।

रिपोर्ट – अमित कुमार भागलपुर/बिहार

बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच कृषि को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से आज बिहार कृषि विश्वविद्यालयए सबौर के अंतर्गत बिहार कृषि कॉलेज के आनुवंशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग द्वारा एक दिवसीय नव-विकसित जलवायु-अनुकूल धान की किस्मों की उन्नत उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण-सह-कृषि इनपुट वितरण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर के प्राचार्य डा० रूबी रानी के द्वारा किया गया। अपने उद्घाटन संबोधन में प्राचार्य महोदया ने खेती पर मंडरा रहे जलवायु परिवर्तन के खतरों को रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से जलवायु-अनुकूल किस्मों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के समय में पारंपरिक कृषि पद्धतियों पर मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ रही है। ऐसे में वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई नई किस्में जो कम पानी सूखा और बाढ़ जैसी विपरीत परिस्थितियों को झेलने में सक्षम हैं हमारे किसानों के लिए सुरक्षा कवच साबित होंगी। उन्होंने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया उत्तम और प्रमाणित बीज हर छोटे से छोटे किसान की पहुँच में होना चाहिए। जब देश का हर किसान उच्च गुणवत्ता वाले जलवायु.अनुकूल बीजों का उपयोग करेगा तभी देश का कुल उत्पादन बढ़ेगा और हम वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न निर्यात में शीर्ष पर बने रहेंगे। यह तकनीक न केवल फसल सुरक्षा सुनिश्चित करेगी बल्कि इनपुट लागत को कम करके किसानों की आय बढ़ाने में भी मील का पत्थर साबित होगी। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डा० एस पी सिंह ने भूमि परिस्थितिकी के अनुसार बिहार कृषि विश्वविद्यालयए सबौर के द्वारा नव-विकसित जलवायु-अनुकूल धान की किस्मों कि उन्नत खेती के बारे में विस्तृत रूप से किसानों को जानकारी दी।
इस अवसर पर परियोजना के सह मुख्य समन्वयक डा० आनंद कुमार ने किसानों को संबोधित करते हुए विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य के तहत देश को धान उत्पादन में आत्मनिर्भर और अग्रणी बनाने का एक दूरदर्शी रोडमैप प्रस्तुत किया। धान की जलवायु-अनुकूल किस्मों यथा सबौर नरेन्द्र, सबौर सोना, सबौर कुवर, सबौर मनसूरी, सबौर सम्पन्न, सबौर प्रताप, सबौर विजय धान की महत्ता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के सपने को हम तब तक पूरा नहीं कर सकते जब तक हमारा अन्नदाता मौसम के खतरों से पूरी तरह सुरक्षित न हो। उन्होंने विकसित भारत 2047 के तहत धान उत्पादन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित चार सूत्रीय रणनीतियाँ साझा कीं स्मार्ट और बहु.तनाव सहिष्णु किस्में अब समय सिर्फ ऐसी फसलों का नहीं है जो अधिक उपज दें बल्कि हमें ऐसी स्मार्ट किस्मों की जरूरत है जो एक साथ कई चुनौतियों से लड़ सकें। हमें ऐसी धान की प्रजातियों को खेतों तक पहुँचाना है जो सूखा भी झेल सकें और अगर 10-15 दिनों तक बाढ़ के पानी में डूबी रहें तब भी उनकी फसल खराब न हो।
सस्य वैज्ञानिक डा० सौरभ कुमार चैधरी ने कहा कि आने वाले समय में पानी का संकट सबसे बड़ा होगा। विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए हमें पारंपरिक रूप से पानी से भरे रहने वाले खेतों की जगह धान की सीधी बुआई और कम पानी वाली तकनीकों को अपनाना होगा जिससे 30 से 40% तक पानी की बचत की जा सके। यह उच्च-स्तरीय कार्यक्रम बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशनश अनुसंधान परियोजना के तहत आयोजित किया गया था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पूर्वी भारत में नई जारी की गई अधिक उपज देने वाली और जलवायु.अनुकूल-फसलों के संकर और किस्मों के प्रसार और क्षेत्रीय प्रदर्शन को गति देना हैए ताकि किसानों की आय और फसल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। डा० मंकेष कुमार ने धान से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए सबौर कतरनी धान- 1 के खेती करने पर जोर दिया एवं इसके खेती के पैकेज प्रणालि के बाने में विस्तृत रूप से चर्चा की।
कार्यक्रम में भागलपुर के विभिन्न क्षेत्रों अकबरनगर- रतनगंज जगदीषपुर, बिरनौध गोराड़ीह, षंभूगंजद् के अनेक प्रगतिशील किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। तकनीकी सत्रों के दौरान वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को नव-विकसित धान की किस्मों की उन्नत खेती पद्धतियों- जैसे वैज्ञानिक नर्सरी प्रबंधन, सटीक जल प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल कीट व रोग प्रबंधन रणनीतियों के बारे में विस्तार से प्रशिक्षित किया गया। इस अवसर पर परियोजना के मुख्य समन्वयकों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि प्रयोगशाला के अनुसंधान और वास्तविक खेतों के बीच की दूरी को कम करना ही पूर्वी भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की असली कुंजी है।
बीएमजीएफ परियोजना के व्यावहारिक क्रियान्वयन को जमीनी स्तर पर उतारते हुए- कार्यक्रम के समापन सत्र में एक विशेष कृषि-इनपुट वितरण समारोह का आयोजन किया गया। इसके तहत चयनित लाभार्थी किसानों को उनके खेतों में तुरंत बुआई और बेहतर प्रदर्शन के लिए नव-विकसित जलवायु-अनुकूल उच्च गुणवत्ता वाले धान के प्रभेद सबौर सोना, सबौर कतरनी धान – 1 और सबौर श्री सब-1 का बीज वितरित किए गए। कार्यक्रम का समापन किसान-वैज्ञानिक संवाद के साथ सम्पन्न हुई।

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