व्यंग्य से लोकतंत्र की सच्चाई और ‘शकुंतला’ से प्रेम–कर्तव्य का संदेश, भागलपुर रंग महोत्सव 2025 का भव्य समापन

रिपोर्ट – अमित कुमार भागलपुर/बिहार।

भागलपुर अपसंस्कृति के खिलाफ रंगकर्म, लोककला और राष्ट्रीय एकता को समर्पित रंगग्राम जन सांस्कृतिक मंच, भागलपुर के तत्वावधान में कला केंद्र, लाजपत पार्क में आयोजित तीन दिवसीय भागलपुर रंग महोत्सव 2025 का तीसरे और अंतिम दिन भव्य एवं विचारोत्तेजक समापन हुआ।
इस महोत्सव में बिहार सहित देश के नौ राज्यों—मणिपुर, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, असम एवं बिहार—से आए प्रतिष्ठित नाट्य और नृत्य दलों ने अपनी सशक्त प्रस्तुतियों से दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विविधता का जीवंत अनुभव कराया।
महोत्सव के अंतिम दिन मंचीय कार्यक्रम का उद्घाटन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, लोक कल्याण शिक्षा स्वास्थ्य समिति की संगीता कुमारी, पंकज कुमार सिंह, तकी अहमद जावेद, जयंत जलद एवं सुमन सोनी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए महोत्सव के मीडिया प्रभारी धीरज शर्मा एवं सुनील कुमार रंग ने बताया कि तीसरे और अंतिम दिन की दोनों नाट्य प्रस्तुतियों ने दर्शकों को न केवल मनोरंजन दिया, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना से भी रूबरू कराया।
पहली प्रस्तुति के रूप में शारदा नाट्य मंच, धनबाद द्वारा प्रख्यात नाटककार अलकनंदन द्वारा लिखित एवं अनिल सिंह के निर्देशन में हिंदी व्यंग्य नाटक “अंधेरी गली में जादू का सूट” का मंचन किया गया।
यह नाटक एक अयोग्य और मूर्ख राजा भोला तथा तीन चालाक डकैतों के इर्द-गिर्द घूमता है, जो सत्ता की वास्तविक शक्ति अपने हाथों में रखकर राजा को कठपुतली की तरह नचाते हैं। डकैत अंग्रेजी सभ्यता और दिखावटी पहनावे के लालच में राजा को उलझाकर कानून की धज्जियां उड़ाते हैं और खुद को जनता का रक्षक साबित करते हैं।
नाटक के माध्यम से यह सशक्त संदेश दिया गया कि यदि सत्ता गलत हाथों में चली जाए और जनता जागरूक न रहे, तो लोकतंत्र केवल दिखावा बनकर रह जाता है। साथ ही यह प्रस्तुति आज के दौर में अपनी संस्कृति छोड़कर विदेशी अंधानुकरण पर करारा व्यंग्य भी करती है।
दूसरी प्रस्तुति के रूप में स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट, संबलपुर (उड़ीसा) द्वारा कालिदास रचित विश्वप्रसिद्ध नाटक “शकुंतला” का मंचन किया गया, जिसका निर्देशन डॉ. चंद्रकांत महानंदा ने किया।
नाटक में शकुंतला के जन्म और पालन-पोषण से लेकर राजा दुष्यंत के साथ उनके प्रेम, गंधर्व विवाह, दुर्वासा ऋषि के शाप, वियोग, अंगूठी की पहचान, पुनर्मिलन और अंततः पुत्र सर्वदमन (भरत) के जन्म तक की कथा को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया।
यह प्रस्तुति प्रेम, कर्तव्य, स्मृति और भाग्य के सुंदर संतुलन को दर्शाती है, जिसने दर्शकों को भावनात्मक रूप से गहराई तक प्रभावित किया।
कार्यक्रम का सफल मंच संचालन कपिल देव रंग, कार्यक्रम संयोजक, द्वारा किया गया। इस अवसर पर महोत्सव के दर्जनों कार्यकर्ता, विभिन्न समितियों के सदस्य, कलाकार और बड़ी संख्या में शहरवासी उपस्थित रहे।
तीन दिनों तक चले इस रंग महोत्सव ने यह संदेश स्पष्ट किया कि रंगकर्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक जागरण का सशक्त माध्यम है।

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