घर में घुसा बाढ़ का पानी… तो स्कूल पहुँचे 50-60 लोग, यहां भी भगाने की कोशिश! टीएनबी कॉलेजिएट में मचा बवाल आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ
रिपोर्ट संजीव कुमार शर्मा भागलपुर बिहार
भागलपुर गंगा के बढ़ते जलस्तर और बाढ़ की विभीषिका के बीच भागलपुर में उस समय तनाव का माहौल बन गया, जब बाढ़ से प्रभावित करीब 50 से 60 लोग शरण लेने के लिए आज सुबह TNB कॉलेजिएट स्कूल पहुँचे। बाढ़ पीड़ितों का आरोप है कि उन्हें स्कूल परिसर से बाहर जाने के लिए कहा जाने लगा, जिसके बाद मौके पर कुछ देर तक बहस और गहमागहमी की स्थिति बनी रही।बाढ़ पीड़ित लोगों का कहना है कि यह उनके लिए कोई नया ठिकाना नहीं है उन्होंने बताया कि पिछले करीब 25 वर्षों से जब भी उनके घरों में बाढ़ का पानी घुसता है, वे इसी स्कूल परिसर में आकर अस्थायी रूप से रहते रहे हैं इस बार भी घरों में पानी भर जाने के बाद परिवार और जरूरी सामान लेकर वे स्कूल पहुँचे थे पीड़ितों के मुताबिक, उनकी संख्या करीब 50-60 थी लेकिन स्कूल में निर्माण कार्य करा रहे ठेकेदार की ओर से उन्हें वहां से चले जाने के लिए कहा जाने लगा। इसके बाद लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।बाढ़ पीड़ितों ने सवाल उठाया कि जब घरों में पानी घुस चुका है, रहने की जगह नहीं बची है और परिवार के सामने सिर छिपाने की समस्या है, तो आखिर वे जाएँ तो जाएँ कहाँ
इसी बात को लेकर मौके पर कुछ देर तक तीखी बहस और घमागहमी होती रही स्थिति बिगड़ती देख बातचीत के जरिए मामले को शांत कराने का प्रयास किया गया बाद में ठेकेदार की ओर से लिखित कार्रवाई की बात कही गई और बाढ़ पीड़ितों को वहां रहने की अनुमति दी गई
और कहा गया की जब तक इलाके के लोग बाढ़ से प्रभावित हैं और उनके घरों में पानी है, तब तक उन्हें स्कूल परिसर में रहने दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि बाढ़ पीड़ितों को रहने, खाने-पीने और अन्य जरूरी मूलभूत सुविधाएँ प्रशासनिक स्तर पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा आश्वासन के बाद मौके पर बना तनाव धीरे-धीरे शांत हुआ।यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है—जब बाढ़ किसी परिवार का घर छीन लेती है, तो राहत शिविर ही उसके लिए आखिरी सहारा होता है। ऐसे में अगर वहां भी जगह को लेकर विवाद खड़ा हो जाए, तो बेबस बाढ़ पीड़ित आखिर कहाँ जाएँ बाढ़ की भयावह स्थिति के बीच यह घटना प्रशासन और संबंधित जिम्मेदार लोगों के लिए भी चेतावनी है कि राहत और आश्रय की व्यवस्था को लेकर संवेदनशीलता बरती जाए, ताकि आपदा की घड़ी में प्रभावित परिवारों को दोहरी परेशानी का सामना न करना पड़े
