अल-नीनो के खतरे के बीच बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों के लिए जारी की विशेष कृषि एडवाइजरी

डेस्क/बिहार
लोकेशन/भागलपुर
रिपोर्ट/अमित कुमार
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अल-नीनो के खतरे के बीच बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों के लिए जारी की विशेष कृषि एडवाइजरी

माननीय कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के निर्देशन में प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं कृषि मौसम विभाग की संयुक्त पहल, वर्षा की कमी से निपटने के लिए वैज्ञानिक उपाय अपनाने की अपील

बिहार में सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत कम मानसूनी वर्षा तथा अल-नीनो की सक्रिय परिस्थितियों को देखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने राज्य के किसानों के लिए विस्तृत कृषि एडवाइजरी जारी की है। यह एडवाइजरी माननीय कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के निर्देशन में प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं मौसम विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है। विश्वविद्यालय ने किसानों से मौसम आधारित वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन अपनाकर संभावित फसल क्षति को कम करने का आह्वान किया है।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार जून के प्रारंभ से जुलाई के अंत तक बिहार में सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार 4 से 13 अगस्त के बीच राज्य के कुछ स्थानों पर हल्की तथा अनेक स्थानों पर मध्यम वर्षा होने की संभावना है। वहीं भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति बनी हुई है तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून के शेष अवधि में इसके और मजबूत होने की संभावना है। ऐसे में किसानों के लिए वैज्ञानिक सलाह का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
एडवाइजरी में किसानों को धान की रोपाई अगस्त के प्रथम सप्ताह तक हर हाल में पूरी करने की सलाह दी गई है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि रोपाई में अधिक विलंब होने पर उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। रोपाई के लिए 18 से 25 दिन पुराने स्वस्थ पौधों का उपयोग करें, पौधों की दूरी 15×15 सेंटीमीटर रखें तथा पर्याप्त संख्या में पौधों का रोपण करें, ताकि नमी की कमी से होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके।
धान की रोपाई के बाद खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडिमेथालिन (1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर) अथवा प्रेटिलाक्लोर (0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर) के प्रयोग तथा 15–20 दिनों बाद खरपतवार की 2–3 पत्ती अवस्था में बिस्पायरीबैक सोडियम (20–25 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर) के छिड़काव की अनुशंसा की गई है। जहाँ संभव हो, कोनो-वीडर के प्रयोग पर भी बल दिया गया है।
विश्वविद्यालय ने पारंपरिक धान-गेहूँ फसल चक्र के स्थान पर फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी है। ऊँची भूमि अथवा पानी की कमी वाले क्षेत्रों में धान के स्थान पर अरहर की उन्नत किस्में—मालवीय-13, आईपीए-203, पूसा-992, यूपीएएस-120, राजेंद्र अरहर-1 एवं बहार—लगाने की अनुशंसा की गई है। बुवाई के समय बीज दर में 15 से 20 प्रतिशत वृद्धि करने तथा मेड़-नाली पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है। किसान अरहर + मक्का (1:1), अरहर + तिल (2:1) तथा अरहर + उड़द (1:2) जैसी मिश्रित खेती भी अपना सकते हैं।
एडवाइजरी में मक्का की डीकेसी-9081, डीएचएम-117, एचक्यूपीएम-1, एचक्यूपीएम-5, शक्तिमान-1 एवं शक्तिमान-4 तथा रागी की वीएलएम-379, आरएयू-8 एवं बांकुला जैसी उन्नत एवं सूखा-सहनशील किस्मों को अपनाने की भी सलाह दी गई है। बुवाई से पूर्व बीजों का राइजोबियम, पीएसबी एवं ट्राइकोडर्मा से उपचार करने की अनुशंसा की गई है।
जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए वैज्ञानिकों ने खेतों की मेड़ों की मरम्मत कर उनकी ऊँचाई 30–35 सेंटीमीटर तक बढ़ाने, खेत में वर्षा जल रोकने तथा लगातार पानी भरकर रखने के बजाय ‘वैकल्पिक गीला एवं सूखा (Alternate Wetting and Drying)’ सिंचाई पद्धति अपनाने की सलाह दी है। साथ ही छतों पर वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, परकोलेशन टैंक, कंटूर बंडिंग, ग्रेडेड बंड, चेक डैम, गली प्लगिंग, रिचार्ज पिट, रिचार्ज कुएँ, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा रेज्ड एवं सनकेन बेड प्रणाली जैसी जल संरक्षण तकनीकों को अपनाने पर विशेष बल दिया गया है।
मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए सूखी घास, पुआल अथवा प्लास्टिक शीट द्वारा मल्चिंग करने, गोबर की खाद एवं वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग, यूरिया को एकमुश्त देने के बजाय 3–4 किस्तों में देने तथा सूखे या पोषण तनाव की स्थिति में 2 प्रतिशत यूरिया अथवा एनपीके (15:15:15) के घोल का पर्णीय छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
किसानों को फसलों की नियमित निगरानी करने, कीट एवं रोग प्रबंधन हेतु फेरोमोन ट्रैप एवं स्टिकी ट्रैप लगाने तथा गंभीर प्रकोप की स्थिति में ही अनुशंसित रासायनिक कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का भी परामर्श दिया गया है।
*माननीय कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि* जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम आधारित वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन ही किसानों की सबसे बड़ी सुरक्षा है। उन्होंने किसानों से विश्वविद्यालय द्वारा जारी इस एडवाइजरी का पालन करने तथा आवश्यकता पड़ने पर कृषि विज्ञान केंद्रों एवं विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क कर वैज्ञानिक सलाह प्राप्त करने की अपील की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन अनुशंसाओं को अपनाकर किसान अल-नीनो के प्रतिकूल प्रभावों को काफी हद तक कम करते हुए खरीफ फसलों का बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।

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